Monday, August 24, 2015

सच्ची प्रीत है मांझी...!



कुछ कहानियाँ ऐसी होती हैं जो अखबार के पन्नों तक सिमट कर रह जाती हैं, कुछ डिनर के वक्त चर्चा का विषय बन जाती हैं, कुछ कहानियाँ टीवी के लिए ब्रेकिंग न्यूज़ (हॉट टॉक) और कुछ ऐसी होती हैं (जिनमें सत्य होता है), जिसकी आपने कभी कल्पना न की हो, उसके साथ सिर्फ बड़ा पर्दा ही न्याय कर पाता है ऐसे ही दशरथ मांझी के सच्चे प्रेम की सच्ची कहानी है 'मांझी -The Mountain Main'।

ऐसी बहुत कम फिल्में होती हैं जिन्हे देखकर आपको कुछ लिखने का दिल करे या वो आपके दिमाग में घूमती रहे लेकिन इस फिल्म में 'सांची रे ,सांची रे मांझी तोरा प्रीत है सांची.....' जैसे शब्द अभी भी प्रतिध्वनि की तरह सुनाई दे रहे हैं।

आज से सात साल पहले जब दिल्ली आया था तो एक मित्र ने मांझी की कहानी बतायी थी, तब भी आश्चर्य हुआ था कि कोई ऐसा कैसे कर सकता है! वाकई प्रेम में एक अदम्य साहस है, मांझी के "विरह में भी एक अजीब प्रेम" है।

उसका एक प्रेम फगुनिया से है लेकिन उसकी मौत के बाद अपनी जान पर बनने के बाद दूसरा प्रेम पहाड़ से भी है, प्रेम के इन दो अलग-अलग रूप को देखकर कभी-कभी आँखें सजल हो जाती हैं।  

ऐसा काम सिर्फ एक सनकी, ठरकी या (बिहारी भाषा में) बौरा गया और प्रेम में डूबा इंसान ही कर सकता है। बेमिसाल छायांकन और सहज संवाद इस फिल्म की सबसे मजबूत कड़ी है।

फिल्में खान, कपूर और अख्तर भी बनाते हैं और वहीं इरफ़ान, नवाज़ और मेनन भी। दोनों तरीके की फिल्मों में अंतर बिलकुल स्पष्ट दिख जाता है।      

सच और कहानी में फर्क होता है, मांझी एक सच है इस समाज का, वर्ग का, उस जातिवाद का जो आज भी मौजूद है और सबसे अधिक एक ऐसे इंसान का जिसने प्रेम और विरह की बीच कुछ ऐसा किया जिसे रूपहले पर्दे पर नवाज़ुद्दीन सिद्दीकी ने जिया है। सरफरोश में 54 सेकंड के किरदार से मांझी के 2 घंटे 04 मिनट तक का सफर नवाज़ का मार्केट रेट तो फिक्स कर ही देता अगर यह फिल्म लीक ना हुई होती।

इस फिल्म को देखते वक्त मुझे 'पान सिंह तोमर' के इरफान की याद आने लगी। जिसे बनाने के बाद एक साक्षात्कार में तिग्मांशु धूलिया ने कहा था कि अगर "हीरो (Khans) को चंबल में शूटिंग के लिए ले जाया जाए तो उनके नाक से खून आ जाएगा।  

कुछ फिल्में हीरो और 'अभिनेता' के बीच का अंतर बताती हैं मांझी उनमें से एक है। केतन मेहता ने एक बार फिर "शानदार, जबरदस्त और जिंदाबाद" फिल्म बनायी है।

कभी-कभी तो ऐसा लगता है मानो पहाड़ भी एक जीवंत किरदार हो, नवाज़ का उन पहाड़ों से बात करना शाहरूख के घोड़े से बतियाने वाले (बनावटी) किरदार से लाखों गुना बढियां लगता है। भारी-भरकम संवाद को सहजता से कहने की कला में जैसे उन्होंने महारत हासिल कर ली हो 'जैसे इ प्रेम में बहुत बल है बबुआ' या अखबार निकालना पहाड़ तोड़े से भी ज्यादे मुश्किल है क्या ।

फगुनिया के छोटे से किरदार में राधिका आप्टे सही लगी हैं वहीं पंकज त्रिपाठी और मुखिया (तिग्मांशु धुलिया) भी अपने किरदार के साथ फिट बैठे हैं। 

यह फिल्म भले ही सौ करोड़ वाले क्लब में शामिल ना हो लेकिन अवार्ड तो जीतेगी ऐसी उम्मीद है।

प्रेम और विरह की बीच कभी पहाड़ भी किसी का साथी हो सकता है इसे भी कमाल तरीके से दर्शाया गया है। सिनेमा हॉल में इस फिल्म को देखने वाले दर्शक कम थे, कुछ दर्शकों को अपच लग रहा था और बहुतों ने तो डाउनलोड कर ही देख लिया होगा।

एक व्यक्ति अपनी जिंदगी खपा देता है एक फिल्म बनाने में, उस पर रिसर्च करने में, एक अभिनेता उस किरदार को जीने में वर्षों लगा देता है और कुछ लोग उसे डाउनलोड कर देख लेते हैं, ऐसी फिल्में कम बनती हैं, ऐसी फिल्मों को हॉल जाकर देखना चाहिए।

वैसे 'On a lighter note'  मैं इस फिल्म को डाउनलोड कर देखने वालों के लिए दो मिनट का मौन रख लूंगा। :P :P

उम्मीद करता हूँ कि इस फिल्म के सफल होने के बाद रियल लाइफ के मांझी (22 साल तक लगातार पहाड़ तोड़ने वाले) के परिवार की स्थिति भी थोड़ी सुदृढ़ होगी। एक और मांझी अभी बिहार के आने वाले विधान सभा चुनाव में सक्रिय भूमिका निभाने वाले हैं लेकिन इस माउंटेन मेन मांझी का राजनीतिकरण ना हो तो खुशी होगी।

रील लाइफ के मांझी को इससे भी बढियां और ढेर सारी फिल्म मिले । मांझी एक बेहद ही उम्दा और शानदार बनी फिल्म है, नवाज़ का फैन तो मैं पहले भी था लेकिन इस फिल्म को देखकर फैनेटिक हो गया, इस बन्दे की फिल्म का इन्तजार करता हूँ।

आपने नहीं देखी है तो उस रियल लाइफ के मांझी के लिए ही सही इसे एक बार देख लीजिए।   
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